साम्यवाद और उसके संघर्ष से जूझता मजदूर

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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अर्थवयवस्था को चलाने के लिए, दो तरह की विचारधारा उभरकर सामने आई| एक विचारधारा को बाजारवाद की विचारधारा बोला गया| इस विचारधारा में निवेश, उत्पादन और वितरण के निर्णय मूल्य संकेतों द्वारा निर्धारित होते हैं| वहीं दूसरी तरफ साम्यवाद (communism) की विचारधारा थी| जहाँ पर उत्पादन और वितरण सब सरकार के अधीन होने की बात हुई| ऐसा इसलिए था ताकि जरुरी चीजें हर व्यक्ति के पहुंच में हो|

बाज़ारवाद की विचारधारा के समर्थक के रूप में अमेरिका और पश्चिमी देश उभरकर सामने आए| वहीं रूस और चीन जैसे देशों ने साम्यवाद (communism) को अपनाया| दिलचस्प बात यह भी रहीं कि इन दोनों विचारधाराओ को अपनाने वाले देशो ने ना सिर्फ इसे अपनाया बल्कि उन देशो का भी समर्थन किया जो इसे अपनाना चाहते थे| इसकी वजह से दुनिया दो हिस्सों में बट गई और एक से दूसरे को नीचा दिखाने के लिए शीत युद्ध शुरू हो गया|

साम्यवाद (communism) की विचारधारा का गठन कई लोगो ने अपने-अपने हिसाब से किया| इसमें जो प्रमुख रूप से सामने आई, वो थी मार्क्स की साम्यवाद (communism) की विचारधारा| मार्क्स का मानना था कि बाज़ारवाद में मज़दूरों को प्रताड़ित किया जाता है और एक दिन मज़दूरों की क्रांति इस बाजारवाद को उखाड़ फेकेंगी| मार्क्स कहते है कि क्रांति के बाद एक साम्यवादी समाज की स्थापना होगी, जहाँ पर सहकारी स्वामित्व होगा|

मार्क्स की विचारधारा के कई समर्थक हुए| कुछ देशों ने आज़ादी के बाद समाजवाद को अपना लिया और जहाँ सरकारें बाज़ारवाद के समर्थन में चल रही थी वहाँ पर आंदोलन होने लगे| भारत में आज़ादी के समय से ही समाजवाद के समर्थन में लोग और नेता थे| आज़ादी के बाद भारत ने समाजवाद को अपनाया जहाँ पर अर्थवयवस्था सरकार के अधीन थी|लेकिन अर्थव्यवस्था का कुछ हिस्सा बाजार के नियंत्रण में भी था|

भारत में समाजवाद होने के बाद भी साम्यवाद (communism) के लिए संघर्ष चलता रहा| आधार हमेशा मजदूरों के लिए बेहतर सुविधाओं को बनाया जाता था| सरकारी उद्योग ज्यादातर मज़दूरों की मांगो को मान लेते थे और उसकी भरपाई सरकारी खजाने से होती थी| पर गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए यह कर पाना हमेशा संभव नहीं होता था| इस संघर्ष में फॅसे कुछ उद्योगों की पतन की कहानी पर एक नज़र डालते है| ऐसा बिल्कुल नहीं है कि साम्यवाद के लिए संघर्ष उनके पतन का इकलौता कारण है|

कानपुर को “ईस्ट का मैनचेस्टर” बोला जाता था और यहाँ की “कपड़ा मिल” विश्व प्रसिद्ध थीं| कानपुर की लाल इमली में बने उत्पाद देश ही नहीं बल्कि दुनिया में एक अलग पहचान रखते थे| कभी अपने कपड़े और वुलेन के लिए पूरी दुनिया में लाल इमली का नाम था| 1876 में इस मिल की शुरुआत हुई, जिसके बाद यहां का उत्पाद लोगों की पहली पसंद बन गई| 1981 में कंपनी का राष्ट्रियकरण हो गया और यह भारत सरकार के अधीन हो गई|

देश की आर्थिक नीति पहले ही समाजवाद पर आधारित थी और साम्यवाद को बढ़ावा देने के लिए कारखानों में मजदूरों के आंदोलन आम थे| सरकारे अपने वोट बैंक बेचने के लिए और आंदोलनों से बचने के लिए सारी मांगे मानती गई और अंततः 1989 के बाद कंपनी को कभी कोई फ़ायदा नहीं हुआ|

2012 से यहाँ पर कोई उत्पादन नहीं हुआ है| नीति आयोग ने लाल इमली (Lal Imli) को बंद करने का सुझाव दिया था| इसके बाद लोक उद्यम विभाग ने बीआईसीएल को बंद करने के लिए नोट तैयार कर लिया है| अब भी कर्मचारियों की मांग है कि 2007 के बेसिक वेतन के साथ छठे वेतन आयोग का लाभ देकर उन्हें सेवानिवृत्त किया जाए। यह कहानी सिर्फ लाल इमली (Lal Imli) की नहीं, भारत में ऐसे ही कई उद्योग और उद्योगों द्वारा बसाये हुए शहर साम्यवाद के लिए संघर्ष में नष्ट हो गए| एक नज़र हाल के घटनाओ पर डाले तो मानेसर में मारुति सुजुकी ( Maruti Suzuki) कार निर्माण संयंत्र में जुलाई 2012 की हिंसा में एक वरिष्ठ एचआर कार्यकारी की मृत्यु हो गई और लगभग 100 अन्य अधिकारी घायल हो गए|

यह घटना कथित तौर पर एक कर्मचारी के साथ अनुशासनात्मक विवाद के कारण शुरू हुई थी। यूनियनों ने उनकी तुरंत बहाली की मांग की, साथ ही ठेका श्रमिकों के लिए स्थायी कर्मचारियों के समान वेतन सहित कई अन्य मांगों को भी रखा, जिस पर प्रबंधन ने ध्यान नहीं दिया। पुलिस ने 148 मजदूरों को गिरफ्तार किया। संयंत्र के तत्कालीन महाप्रबंधक दीपक आनंद ने 600 श्रमिकों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, दंगा करने और मारपीट करने का आरोप लगाया था। भारी सुरक्षा के बीच मारुति सुजुकी ने August 21, 2012 को अपने संयंत्र में उत्पादन शुरू किया।

लाल इमली और मारुती की कहानी में उद्योग का नुकसान आम रहा| साम्यवाद की राजनीती में मजदूरों की परेशानियों को ही मुद्दा बनाया जाता है और उनका उदेश्य सिर्फ राजनितिक होता है|

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