जानिये क्यों मनाते है श्राद्ध और क्या है पितृपक्ष के सोलह दिनों का महत्त्व

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हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिये अपने पूर्वज़ों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

पितृपक्ष के 16 दिनों का विशेष महत्व- पितृपक्ष पूर्णिमा से अमावस्या तक 16 दिन का होता है। श्राद्ध की 16 तिथियां हैं। धर्मशास्त्रों की मानें तो प्रत्येक मनुष्य की मृत्यु इन 16 तिथियों को छोड़कर अन्य किसी दिन नहीं होती। यानि कि जब किसी की मृत्यु होती है तो उस दिन इन 16 तिथियों में से कोई एक तिथि अवश्य होती है। इसलिए तिथि के हिसाब से हर दिन अलग-अलग लोगों के लिए श्राद्ध होता है।

ऊपर बताई गई 16 तिथियों में से एक तिथि में यदि किसी की मृत्यु होती है चाहे वह कृष्ण पक्ष की तिथि हो या शुक्ल पक्ष की। श्राद्ध में जब यह तिथि आती है तो जिस तिथि में जातक की मृत्यु हुई है उस तिथि में उसका श्राद्ध करने का विधान है। इसलिए इन 16 तिथियों के 16 दिन होते हैं। है। अगर किसी मृत व्यक्ति के मृत्यु की तिथि के बारे में जानकारी नहीं होती है। तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति का श्राद्ध अमावस्या तिथि पर किया जाता है। इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। इस अवधि में हम अपने पितरों को नमन करते हैं और उनतक अपने भाव पहुंचाते हैं।

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