जंग आजादी की बेखौफ ख्यालों की

एडवोकेट ममता शर्मा बीए. एलएल.बी., एलएल. एम., पीएचडी. रिसर्च स्कॉलर लाॅ, इंडियन एंड वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर, लेखक, एजुकेशनिस्ट, सोशलिस्ट, स्पीकर, करियर काउंसलर, लाइफ कोच

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हमारे भारतवर्ष को आजाद हुए 75 वर्ष पूरे हुए। समय के साथ-साथ एक शताब्दी भी पूरी हो जाएगी। आजादी के दीवानों, मतवालों की कहानियां ना जाने कितनों की जबानी और कितनों की जिन्दगानी बन चुकी हैं। आजादी के लिए इन महायोद्धाओं ने दीवानों की तरह अपनी आजादी की मंजिल पा लेने का हौसला तो था, लेकिन बर्बादियों का उन्हें खौफ कभी नहीं था। आजादी के उन दीवानों को कभी-कभी तो रोटियां भी मयस्सर नहीं होती थी। लेकिन उन्हें कभी भी परवाह नहीं थी दीवानों की तरह यह आजादी के दीवाने मतवाले बस आजादी के दीवाने थे परवाह न था, दीवानों की तरह बस आजादी के दीवाने थे। आजादी की मंजिलों की तरफ बढ़ते चले गये, न जाने कितने बड़े से बड़े जुल्मों सितम भी उनके कदमों को न रोक पाये, कोई बात उनके सामने ऐसी नहीं थी कोई समस्या ऐसी नहीं थी जिसके सामने उन्होंने अपने घुटने टेके हो। अपनी उम्मीदों, हौसलों से वे आसानी से हर मुश्किल का सीना चिरते हुए आजादी की मंजिल की तरफ बढ़ते ही चले गये। हिसाब नहीं है किसी के पास, न कीमत है उनकी कुर्बानियों की, सँभाल कर रख सकें उनके जिगर के टुकड़े आजादी को सही सलामत, जिस आजादी के लिए उन्होंने अपने प्राणों की कुर्बानियां दी थी हंसते-हंसते। यही कीमत हो सकती है उनकी बेहिसाब कुर्बानियों की, उनकी मेहरबानियों की। हम आजाद हुए, कितना कुछ बदल गया, खुली हवा में साँस तो ले सकते हैं, दो वक्त की रोटियां तो मिल जाती हैं, बेगार के एवज में किसी के लात घुंसे तो नहीं खाने पड़ते हैं, बहुत कुछ बदल गया। कम से कम अपने मौलिक अधिकारों के अधिकारी तो हैं, मुँह से एक शब्द निकालना गुनाह तो नहीं है। बहुत बड़ी बात है हम आजाद हैं, खुली हवा में सांस ले सकते हैं। लेकिन यह तब ज्यादा अच्छा होगा जब हम हमेशा रह सके। दूसरों को भी आजाद कर सकें, गरीबी से, भ्रष्टाचार से, अज्ञानता से और अंधविश्वास की गुलामी से। इंसानों के बंधनों से आजाद हम हो गये, क्या अपने मन के कुसंस्कारों के बन्धन से आजादी मिली हमें। हमारी आजादी सही मायने में तब आजादी है। जब हम अपने अधिकारों के चलते किसी दूसरे के अधिकारों का हनन ना करें। अपने कर्तव्यों को भी निभाए तभी हमारे उन महान वीरों की कुर्बानियां सफल होंगी।जिनकी वजह से हमें आजादी मिली। दूसरों से लड़कर तो हम उनके बन्धनो से तो आजाद हो गये, जो हमारे अपने स्वयं के अन्दर व्याप्त बुराइयां, कुसंस्कार है, उनसे लड़कर कितने लोग आजाद हो पाते हैं। हमें ये आजादी एक दिन में नहीं मिली, शताब्दियां लग गयीं, पहले तुर्की, अफगानी, ब्रिटिशर्स, फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली। इन बातों को भी समझने में ना जाने और कितना समय लगेगा। एक विद्यार्थी पहले अपने स्कूल की पढ़ाई फिर कॉलेज की पढ़ाई पूरी करता है। जिसमें उसे कम से कम पन्द्रह वर्ष तो लग ही जाते हैं, तो एक अपने अनुभव से ज्ञान प्राप्त करने वाले व्यक्ति को भी कम से कम 15-16 वर्ष लग ही जायेंगे, कुछ ज्यादा भी लग जाये तो भी कोई हैरानी की बात नहीं है, और उसका सारा जीवन भी बीत जाए तो ज्ञान प्राप्त न हो तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि ज्यादातर यही होता है। अगर किसी को 15-16 वर्ष से पहले ज्ञान प्राप्त हो भी जाए तो वह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ज्ञान उसे कैसे भी प्राप्त हो, जब भी हो, जैसे भी हो, जब-तक प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित नहीं हो जाता। किसी भी बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है।

यह तो मनुष्य के ऊपर ईश्वर की विशेष कृपा रही है कि उसने कभी मुकुराहटें नहीं बिकने दी बाजारों में वरना तो उन पर भी न जाने कितनी पाबंदियां होती। फिर तो ना जाने कितने लोग सिर्फ ख्वाबों में ही देखते। हम कैसी आजादी और किस आजादी की बात करते हैं। आम आदमी को तो आजादी का सही से मतलब भी नहीं पता। एक गरीब आदमी जो रोटी के लिए मजबूर रहता है उसे इसकी कीमत नहीं पता। विकास की चकाचौंध, विकास के आंकड़े, विकास की दर, ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी की टेक्नोलॉजी, वहीं आज भी अपने पेट पालने के लिए और दाल-रोटी के जुगाड़ में सुबह होते ही मजदूर किसी भिखारी की तरह काम तलाश करते नजर आते हैं। आज जहां हमारे देश में भुखमरी और गरीबी के कारण लोग अपने जिगर के टुकड़े को बेच देते हैं, दूसरी ओर बाढ़ और सूखे के कारण किसान आत्महत्या करने को विवश होते हैं। हमारा भारत वर्ष धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है फिर क्यों हम आज भी अपने आप को जाति-पाति के बंधनों से आजाद नहीं कर पाए? आज भी हमारे समाज में धार्मिक कुरीतियां फैली हुई है। कभी हम मजहब के नाम पर लड़ते हैं, कभी जाति-पाति के नाम पर लड़ते हैं, कभी अपने बच्चों को भी धर्म, जाति-पाति की बलि चढ़ा देते हैं ऑनर किलिंग करते हैं, कभी एक-दूसरे को मारते हैं। क्यों आज भी अगर घर में किन्नर बच्चा पैदा हो जाए तो क्यों नहीं अपनाया जाता, क्यों फेंक दिया जाता है उसे, दर-दर की ठोकरें खाने के लिए? क्यों महामारी के काल में भी मानवता तार-तार हुई सांसो का भी व्यापार हुआ, फिर मानवता शर्मसार हुई। बदलनी होगा हमें अपनी सोच को, सोचना होगा एक नए ढंग से। क्यों आज भी आजादी के 75 वर्ष बाद भी हम अपने खयालों से बेखौफ आजाद नहीं है, आज भी हमारे समाज की महिलाएं, वृद्धा, बच्चियां सुरक्षित नहीं है? बेखौफ ना ही कहीं आ सकती है, ना ही कहीं जा सकती हैं। क्यों आज भी उन पर बंधनों की बेड़ियां है? क्यों आज भी उनको जकड़ा हुआ है? वे बेखौफ खुली हवा में सांस नहीं ले सकती, कहीं आ जा नहीं सकती। न जाने कब मनुष्यरुपी दानव अपनी तुच्छ मानसिकता से आजाद होगा। मासूम सी बच्चियों, महिलाओं, वृद्धाओं के साथ बलात्कार, निर्दयता पूर्ण उनकी हत्या करना। कब बदलेगी यह सोच, कब बदलेगा मेरा भारतवर्ष, कब मिलेगी ऐसी मानसिकताओं से आजादी, जो राह चलती बहू-बेटियों के साथ, उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ करते हैं। दहेज रूपी दानव के रूप में कब उनको वह दानव जला देगा, फांसी पर लटका देगा, उसे पता भी ना चलेगा। यह जंग आजादी की जिसके लिए हमारे न जाने कितने महान वीर योद्धाओं ने अपने प्राणों को न्यौछावर किया,यह आजादी तब जाकर हमें मिली है। लेकिन आज हमें अपने आप को आजाद करना होगा उस बुरी मानसिकता से जिसने हमें जकड़ा हुआ है। जो हमें आगे बढ़ने से रोकती है। अपनी ही बहू-बेटियों की इज्जत करने से रोकती है, उनका सम्मान करने से रोकती है। वह भी बेखौफ रहना चाहती है, बेखौफ जीना चाहती है, बेखौफ आजाद रहना चाहती है। ना जाने कहां गई हमारी मानव हृदय की व्यथा। हमारे भारत की यह छवि उजली और धुंधली दोनों तस्वीर पेश करती हैं। एक तरफ उजाला ही उजाला और एक तरफ अंधेरा ही अंधेरा। हमारे भारत की यह तस्वीर बहुत कुछ बोलती है। असंगठित क्षेत्र के साथ हर बार अन्याय होता है और वे छले जाते हैं। एक तरफ बेटियां इतिहास रचती है, मेडल जीतती है, और दूसरी तरफ अपनी ही आजादी की जंग लड़ती है। होना होगा आजाद हमें उन बुरे विचारों से, उन बुरी कुरीतियों से, उन बुराइयों से, जो हमें आज भी आगे बढ़ाने से रोकती है। ताकि एक नया भारतवर्ष बन सके अपनी सकारात्मक सोच के साथ, सकारात्मक नजरिए के साथ, अपनी सोच को बदलें। सभी का सम्मान करें, अपने बुजुर्गों का सम्मान करें उनकी सेवा करें। अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की भी वे पूर्ति करे। अपने देश की आन, बान और शान की रक्षा करें उसकी धरोहर का सम्मान करें।

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