जानें क्या है सत्यनारायण की कथा कराने का महत्त्व

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किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत या फिर मनोकामना पूरी होने पर सत्यनारायण की कथा का पाठ किया जाता है। आज इस लेख में हम आपको सत्यनारायण की कथा का महत्व बताएँगे। शास्त्रों में लिखा है की सत्यनारायण की कथा कराने से हजारो सालो तक यज्ञ कराने के बराबर फल मिलता है। पूरे भारत में इस कथा को पूर्ण भक्ति भाव से करने वाले अनगिनत लोग हैं। ऐसा माना जाता है कि सत्य नारायण भगवान की कथा भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की कथा है।

सत्य नारायण कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान श्री हरि विष्णु शिव सागर में विश्राम कर रहे थे उस समय नारद वहां पधारे। नारद को देख भगवान विष्णु ने उनसे पूछा कि- हे महर्षि आपके आने का प्रयोजन क्या है? तब नारद जी श्री हरि विष्णु से बोले कि प्रभु ! मुझे कोई ऐसा सरल और छोटा उपाय बताएं जिसे करने से पृथ्वी वासियों का कल्याण हो। उनकी बात सुनकर भगवान विष्णु बोले- हे देवर्षि! जो व्यक्ति सांसारिक सुखों को भोगना चाहता है और मरणोपरांत स्वर्ग जाना चाहता है उसे सत्य नारायण पूजा अवश्य करनी चाहिए।

भगवान विष्णु ने देव ऋषि नारद को सत्य नारायण कथा की पूरी जानकारी दी। भगवान विष्णु के द्वारा बताए गए सारे वृतांत को मुनि वेदव्यास ने स्कंद पुराण में वर्णित कर दिया। इसके बाद सुखदेव मुनि द्वारा ऋषियों को इस व्रत के बारे में बताया गया और सत्यनारायण कथा का व्रत जितने भी लोगों ने किया, जैसे बूढ़ा लकड़हारा, धनवान सेठ, ग्वाला और लीलावती-कलावती इन सभी की कहानी सत्य नारायण कथा का भाग बनी।

कथा का महत्व

  • गृह शान्ति और सुख समृद्धि के लिए इनकी पूजा विशेष लाभ देती है।
  • ये पूजा शीघ्र विवाह के लिए और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए भी लाभकारी है।
  • ये पूजा संतान के जन्म के अवसर पर और संतान से जुड़े अनुष्ठानों पर बहुत लाभकारी है।
  • विवाह के पहले और बाद में सत्यनारायण की पूजा बहुत शुभ फल देती है।
  • आयु रक्षा तथा सेहत से जुड़ी समस्याओं में इस पूजा से विशेष लाभ होता है।

किस प्रकार करें भगवान सत्यनारायण की पूजा?

  • घर के ब्रह्म स्थान पर केले के पौधों से मंडप बनाएं।
  • भगवान सत्यनारायण के विग्रह या चित्र की स्थापना करें।
  • कलश और दीपक की भी स्थापना करें।
  • पहले गौरी गणेश और नवग्रहों का पूजन करें।
  • इसके बाद सत्यनारायण भगवान् की पूजा करें।
  • उन्हें फल, पंचामृत, पंजीरी, वस्त्र और तुलसी दल जरूर अर्पित करें।
  • फिर उनकी व्रत कथा कहें या सुनें और आरती करें।
  • इसके बाद फल और प्रसाद बांटें।

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